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* सुरेन्द्र वर्मा (डा०)
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September 18, 2013
लड़े जा रही
लड़े जा रही
अपने ही बिंब से
मूर्ख चिड़िया
-डा॰ सुरेन्द्र वर्मा
["धूप कुन्दन" हाइकु संग्र्ह से]
November 21, 2011
सहमी डरी
सहमी डरी
झरतीं चुपचाप
पीली पत्तियाँ।
-डा० सुरेन्द्र वर्मा
( '
धूप कुंदन
'
हाइकु संग्रह से साभार
)
सर्द रात में
सर्द रात में
एक अकेली हवा
बजाती सीटी।
-डा० सुरेन्द्र वर्मा
( '
धूप कुंदन
'
हाइकु संग्रह से साभार
)
शाम होते ही
शाम होते ही
झुका सूरज
,
लाल
हो गई नदी।
-
डा० सुरेन्द्र वर्मा
( '
धूप कुंदन
'
हाइकु संग्रह से साभार
)
बिछ गए हैं
बिछ गए हैं
सूर्य के स्वागत में
हरसिंगार।
-
डा० सुरेन्द्र वर्मा
( '
धूप कुंदन
'
हाइकु संग्रह से साभार
)
छोटी सी धार
छोटी-सी धार
चट्टानों को काटती
झरना बनी।
-
डा० सुरेन्द्र वर्मा
( '
धूप कुंदन
'
हाइकु संग्रह से साभार
)
तुम्हारी हँसी
तुम्हारी हँसी
भीगे हुए चनों में
फूटे हैं किल्ले।
-
डा० सुरेन्द्र वर्मा
( '
धूप कुंदन
'
हाइकु संग्रह से साभार
)
चुप थी घाटी
चुप थी घाटी
जाग गई सहसा
चिड़िया बोली।
-
डा० सुरेन्द्र वर्मा
( '
धूप कुंदन
'
हाइकु संग्रह से साभार
)
खेत गेंदे का
खेत गेंदे का
उठाता है लहरें
पीली सुगंध।
-डा० सुरेन्द्र वर्मा
( '
धूप कुंदन
'
हाइकु संग्रह से साभार
)
अंधेरी रात
अंधेरी रात
चुनौती ली तारों ने
जागते रहो।
-डा० सुरेन्द्र वर्मा
( '
धूप कुंदन
'
हाइकु संग्रह से साभार
)
September 4, 2011
मेघ रीतते
मेघ रीतते
इसीलिए भरते
वे फिर फिर
-डा० सुरेन्द्र वर्मा
(
हाइकु दर्पण
,
अंक
-8
से
)
August 28, 2011
चुप थी घाटी
चुप थी घाटी
जाग गई सहसा
चिड़िया बोली ।
-डा० सुरेन्द्र वर्मा
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